ब्यूरो रिपोर्ट, सीतापुर: विकास खंड महमूदाबाद की ग्राम पंचायत रमद्वारी द्वितीय में मनरेगा मजदूरी की धनराशि हड़पे जाने का मामला सामने आया है। गांव निवासी एक मजदूर ने जिलाधिकारी सीतापुर को शिकायती पत्र देकर ग्राम प्रधान सहित दो लोगों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित ने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई तथा अपनी बकाया मजदूरी दिलाए जाने की मांग की है।
ग्राम पंचायत रमद्वारी द्वितीय निवासी गिरीश चन्द्र पुत्र बाबादीन ने जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में बताया कि वह और उनकी पत्नी माधुरी देवी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत पंजीकृत श्रमिक हैं। उनका जॉब कार्ड संख्या 000436 है। आरोप है कि दोनों ने मनरेगा के तहत निर्धारित कार्य किया था, जिसके एवज में उन्हें 100-100 दिनों की मजदूरी का भुगतान मिलना था।
पीड़ित के अनुसार, ग्राम प्रधान सत्येन्द्र उर्फ रिकू तथा अमरेन्द्र उर्फ हिन्दू ने कथित रूप से मिलीभगत कर धोखाधड़ीपूर्वक उनके बैंक खाते से मशीन पर अंगूठा लगवाकर पूरी मजदूरी की धनराशि निकाल ली। गिरीश चन्द्र का कहना है कि उन्हें यह जानकारी बाद में हुई कि उनके खाते से मजदूरी का भुगतान निकाला जा चुका है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जब उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई वापस मांगी तो उन्हें लगातार टालमटोल का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं, दोबारा पैसे मांगने पर उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया, गाली-गलौज की गई और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए धमकियां भी दी गईं। पीड़ित का कहना है कि आरोपितों ने मजदूरी की रकम लौटाने से साफ इनकार कर दिया।
गिरीश चन्द्र ने अपने प्रार्थना पत्र में उल्लेख किया है कि वह एक गरीब मजदूर हैं और परिवार का भरण-पोषण दैनिक मजदूरी के सहारे करते हैं, जबकि आरोपित पक्ष प्रभावशाली होने के साथ राजनीतिक पहुंच भी रखता है। ऐसे में उन्हें निष्पक्ष न्याय मिलने को लेकर आशंका बनी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व में दिए गए शिकायती पत्रों पर अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
पीड़ित मजदूर ने जिलाधिकारी से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए जाने, दोषियों के विरुद्ध विधिक एवं दंडात्मक कार्रवाई किए जाने तथा उनकी एवं उनकी पत्नी की बकाया मनरेगा मजदूरी तत्काल दिलाए जाने की मांग की है।
हालांकि, समाचार लिखे जाने तक इस मामले में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी और न ही आरोपित पक्ष का पक्ष प्राप्त हो सका था। ऐसे में आरोपों की सत्यता प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
