ब्यूरो रिपोर्ट , सीतापुर : डिजिटल युग में जहां दिन की शुरुआत सूरज की सुनहरी किरणों से नहीं, बल्कि स्मार्टफोन की ब्लू लाइट से होने लगी है, वहीं मानव जीवन तेजी से प्रकृति से दूर होता जा रहा है। यह बढ़ती दूरी अब केवल जीवनशैली का मुद्दा नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। इसी संदर्भ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ता आदर्श अवस्थी ने ‘स्क्रीन टाइम से ग्रीन टाइम’ विषय पर एक प्रभावशाली जागरूकता लेख के माध्यम से समाज को प्रकृति की ओर लौटने का संदेश दिया है।
आदर्श अवस्थी ने कहा कि आज एक औसत व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 7 से 8 घंटे मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों पर व्यतीत कर रहा है। इसके दुष्परिणाम केवल आंखों की थकान या गर्दन दर्द तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रहे हैं। अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, तनाव और सोशल मीडिया के कारण बढ़ती तुलना की प्रवृत्ति व्यक्ति को अकेलेपन की ओर धकेल रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘ग्रीन टाइम’ केवल पार्क में टहलने भर का नाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ पांचों इंद्रियों के गहरे जुड़ाव की प्रक्रिया है। हरियाली, स्वच्छ हवा और खुले वातावरण में समय बिताने से तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर घटता है, एकाग्रता बढ़ती है और मन को प्राकृतिक शांति मिलती है। आदर्श अवस्थी ने आमजन से कुछ सरल लेकिन प्रभावी उपाय अपनाने का आह्वान किया—
20-20-20 नियम अपनाएं: हर 20 मिनट स्क्रीन देखने के बाद 20 फीट दूर किसी पौधे या हरियाली को 20 सेकंड तक देखें।
बच्चों के लिए प्रतिदिन ‘ग्रीन ऑवर’ निर्धारित करें, ताकि वे गैजेट्स से दूर रहकर मिट्टी, धूप और पेड़ों से जुड़ सकें।
डिजिटल उपवास के रूप में रोज कम से कम एक घंटा नो-गैजेट ज़ोन बनाकर परिवार और प्रकृति के साथ समय बिताएं।
नंगे पैर घास पर चलना और डूबते सूरज को निहारना प्राकृतिक उपचार के रूप में मानसिक संतुलन प्रदान करता है।
अंत में उन्होंने कहा कि समाधान तकनीक को पूरी तरह छोड़ने में नहीं, बल्कि उसे अनुशासित और संतुलित रूप में अपनाने में है। डिजिटल प्रगति आवश्यक है, लेकिन प्रकृति से कटाव विनाशकारी हो सकता है। सच्ची, स्थायी शांति और स्वस्थ जीवन का मार्ग प्रकृति के साथ बिताए गए समय से होकर ही गुजरता है।
